उडुपी: संविधान सभी धर्मों को अपने हिसाब से खाने, पीने, ओढ़ने, पैसे की आज़ादी देता है, लेकिन कभी-कभार संस्थानों में ड्रेस कोड को लेकर बहस छिड़ जाती है। हाल ही में कर्नाटक के एक कॉलेज में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगाने का मामला सामने आया था जिसको लेकर छात्राओं ने कोर्ट ने रुख़ किया। अब उडुपी हिजाब मामले में कर्नाटक मंत्री बीसी नागेश का हस्तक्षेप सामने आया है। नागेश ने कहा कि,हम नहीं चाहते थे कि शिक्षा संस्थान दो समुदायों का युद्धक्षेत्र बने। यह एक पवित्र स्थान है और प्रत्येक छात्र को समान महसूस करना चाहिए। हमने स्पष्ट रुख अपनाया कि संस्थानों के परिसर में ऐसा नहीं किया जाना चाहिए।

कर्नाटक के शिक्षा मंत्री बीसी नागेश ने कहा, हमने कहा है कि हम समिति बनाएंगे जो अगले शैक्षणिक वर्ष तक अंतिम रिपोर्ट देगी और सरकार उस पर कड़ा रुख अपनाएगी।

याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उडुपी में स्थित सरकारी पीयू कॉलेज ने उसे और अन्य मुस्लिम छात्राओं को इस आधार पर कक्षाओं में जाने से रोक दिया कि वे हिजाब (हेडस्कार्फ़) पहनती हैं। याचिका में कहा गया है कि कॉलेज ने उन्हें उनके परिसर और कक्षाओं में प्रवेश से वंचित करना जारी रखा है।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि, “अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म के अधिकार दोनों की गारंटी संविधान द्वारा दी गई है।इसके बावजूद, याचिकाकर्ता और अन्य छात्राओं को इस्लामिक आस्था से संबंधित होने के कारण मनमाने ढंग से बाहर कर दिया गया, इस प्रकार उन्हें कॉलेज तक पहुंच और शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया गया।”

अनुच्छेद-25 ने दिया है अधिकार

याचिका में दावा किया गया कि हिजाब, इस्लाम का एक अनिवार्य हिस्सा है और संविधान के अनुच्छेद 25 (1) के तहत संरक्षण प्राप्त है जो धर्म को मानने, अभिव्यक्त करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है।

अनुच्छेद 25 उक्त ड्रेस कोड की रक्षा करता है, जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य को ठेस नहीं पहुंचाता है। यह दावा किया गया था कि, याचिकाकर्ता को केवल उसके कपड़ों के कारण उसे शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया गया है और संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ अनुचित प्रतिबंधों के अधीन किया जा रहा है।