बार एंड बेंच : सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के गठन को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार के गैर-अनुपालन पर असंतोष व्यक्त किया है। बता दें कि, अदालत ने आज केंद्र सरकार पर 7500 रुपये का सांकेतिक जुर्माना लगाया है। जिस याचिका पर यह जुर्माना लगाया गया है उसे भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने दाखिल किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने आज भारत के आठ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक घोषित करने की मांग करने वाली अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया ।याचिका में आठ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक समुदायों को दिए जाने वाले लाभों के विस्तार की भी मांग की गई है जहां अन्य समुदाय बहुसंख्यक हैं।

जस्टिस बीआर गवई और सूर्यकांत के साथ सीजेआई एसए बोबडे की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा कि कोर्ट ने कभी नहीं माना कि धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा राज्य की सीमाओं के अनुसार तय किया जाना चाहिए। सीजेआई बोबडे ने कहा,

धर्म को अखिल भारतीय रूप में समझा जाना चाहिए, राज्यों की राजनीतिक सीमाओं पर नहीं ।”

याचिकाकर्ता के अनुरोध को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज करते हुए कहा,

कौन नहीं जानता कि कौन हिंदू है, कौन मुस्लिम है … आपको यह बताने के लिए दिशानिर्देशों की आवश्यकता है कि कौन हिंदू है, कौन मुस्लिम?”

 

अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका में निवेदन किया गया था कि एक राज्य में अल्पसंख्यकों की पहचान उनकी स्थिति के आधार पर की जाए।इसके लिए याचिकाकर्ता ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 की धारा 2(सी) को समाप्त करने की मांग की।उन्होंने 1993 में केंद्र सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना को रद्द करने की भी मांग की है जिसके द्वारा मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जोरास्ट्रियन को अल्पसंख्यक के रूप में अधिसूचित किया गया था।

जुलाई 2021 में, आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि उसके पास उन राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक घोषित करने का अधिकार नहीं है जहां वे बहुसंख्यक नहीं हैं। आयोग की प्रतिक्रिया ने आगे विस्तार से बताया कि एक समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने का भंडार केंद्र के पास है और इस शक्ति को आयोग द्वारा हड़पा नहीं जा सकता ‌।