कांवड़ यात्रा 2026 कब शुरू होगी और कब होगा समापन? जानिए सावन, शिवरात्रि और जलाभिषेक से जुड़ी पूरी जानकारी
कांवड़ यात्रा 2026 कब शुरू होगी और कब खत्म होगी? जानें सावन, शिवरात्रि, गंगाजल अभिषेक और कांवड़ यात्रा से जुड़ी पूरी जानकारी।
कांवड़ यात्रा 2026: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए बेहद खास माना जाता है। इस पवित्र महीने में देशभर में शिव मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। सावन के दौरान निकलने वाली कांवड़ यात्रा भी हिंदू धर्म की प्रमुख धार्मिक यात्राओं में से एक है, जिसमें लाखों शिवभक्त कंधे पर कांवड़ लेकर पवित्र नदियों से जल लाते हैं और भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं।
साल 2026 में सावन माह 30 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त तक चलेगा। इसी के साथ कांवड़ यात्रा की शुरुआत भी होगी। भक्त हरिद्वार, ऋषिकेश, गोमुख और अन्य पवित्र स्थानों से गंगाजल लेकर शिव मंदिरों की ओर रवाना होंगे।
कांवड़ यात्रा 2026 कब से शुरू होगी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वर्ष 2026 में कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से शुरू होगी। सावन शुरू होते ही शिवभक्त पवित्र नदियों से जल भरकर अपनी यात्रा आरंभ करेंगे।
केसरिया वस्त्र पहने कांवड़िए “बम भोले” और “हर हर महादेव” के जयकारों के साथ लंबी दूरी तय करते हैं। कई भक्त सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर भगवान शिव को जल अर्पित करते हैं।
कांवड़ यात्रा 2026 का समापन कब होगा?
कांवड़ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण दिन सावन शिवरात्रि माना जाता है। इसी दिन कांवड़िए भगवान शिव का जलाभिषेक कर अपनी यात्रा पूरी करते हैं।
साल 2026 में सावन शिवरात्रि के अवसर पर शिव मंदिरों में जलाभिषेक किया जाएगा और इसी के साथ कांवड़ यात्रा का समापन माना जाएगा। भक्त इस दिन महादेव को गंगाजल अर्पित कर अपनी मनोकामना और व्रत पूर्ण करते हैं।
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क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा?
कांवड़ यात्रा भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि सावन महीने में गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक करने से भक्तों को पुण्य फल प्राप्त होता है और महादेव उनकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
इस यात्रा में भक्त कठिन नियमों का पालन करते हुए पवित्र जल लेकर आते हैं। कई कांवड़िए बिना रुके पैदल यात्रा करते हैं और शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं।
रावण से जुड़ी है कांवड़ यात्रा की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, यात्रा की शुरुआत का संबंध भगवान शिव के परम भक्त रावण से भी जुड़ा हुआ है।
मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान जब विष निकला तो भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और शरीर में गर्मी बढ़ गई।
भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए देवताओं और रावण ने गंगाजल से उनका अभिषेक किया। इसी परंपरा के आगे बढ़ने के रूप में सावन में गंगाजल से शिवजी का जलाभिषेक और यात्रा की मान्यता प्रचलित हुई।
सावन में शिवभक्ति का बढ़ जाता है महत्व
सावन महीने में भगवान शिव की पूजा, रुद्राभिषेक, जलाभिषेक और यात्रा का विशेष महत्व होता है। देशभर के शिव मंदिरों में इस दौरान भक्तों की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं।
यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि आस्था, अनुशासन और भगवान शिव के प्रति अटूट विश्वास का प्रतीक भी मानी जाती है। हर साल लाखों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होकर महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
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