अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने आबकारी नीति मामले में CBI की पुनरीक्षण याचिका खारिज करने की मांग की। जानें पूरी कानूनी वजह।
दिल्ली की आबकारी नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की ओर से दाखिल की गई पुनरीक्षण याचिका को खारिज करने की मांग करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। दोनों नेताओं का कहना है कि CBI की याचिका बेहद जल्दबाजी में और गंभीरता से विचार किए बिना दाखिल की गई है।
मनीष सिसोदिया की ओर से 12 अगस्त 2026 को दायर आवेदन में CBI की याचिका की सुनवाई योग्य होने पर शुरुआती आपत्ति उठाई गई है। आवेदन के मुताबिक, राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष CBI जज ने 27 फरवरी 2026 को आबकारी नीति मामले में सभी 23 आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया था। इसके कुछ ही घंटों के भीतर CBI ने इस फैसले को चुनौती देने वाली पुनरीक्षण याचिका दाखिल कर दी।
549 पन्नों के फैसले को कुछ घंटों में चुनौती देने पर सवाल
सिसोदिया ने अपनी याचिका में कहा है कि ट्रायल कोर्ट का फैसला करीब 549 पन्नों और 1,135 पैराग्राफ का है। अदालत ने इस मामले में दो महीने से अधिक समय तक विस्तृत दलीलें सुनने के बाद फैसला सुनाया था। ऐसे में उनका तर्क है कि इतने विस्तृत फैसले का अध्ययन और उसके निष्कर्षों पर गंभीरता से विचार करने के लिए कुछ घंटे पर्याप्त नहीं हो सकते।
सिसोदिया ने आरोप लगाया कि CBI की याचिका जिस तेजी से दाखिल की गई, उससे यह स्पष्ट होता है कि एजेंसी ने ट्रायल कोर्ट के विस्तृत फैसले में दर्ज निष्कर्षों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं किया।
‘रिवीजन याचिका के नाम पर अपील’ का आरोप
पूर्व उपमुख्यमंत्री ने हाईकोर्ट में दायर आवेदन में दावा किया है कि CBI की याचिका वास्तव में रिवीजन पिटीशन की सीमाओं के भीतर नहीं आती, बल्कि अपील की तरह पेश की गई है। उनका कहना है कि CBI ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी खास पैराग्राफ, निष्कर्ष या हिस्से की पहचान नहीं की है, जिसे गैरकानूनी, मनमाना या न्यायिक अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गंभीर गलती बताया जा सके।
सिसोदिया ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पुनरीक्षण अधिकार का इस्तेमाल सीमित परिस्थितियों में किया जाता है। इसमें स्पष्ट कानूनी गलती, अधिकार क्षेत्र से जुड़ी त्रुटि, गंभीर रूप से गलत निष्कर्ष, सबूतों की अनदेखी या न्यायिक विवेक के मनमाने इस्तेमाल जैसी स्थितियां शामिल हो सकती हैं।
सबूतों की दोबारा जांच पर भी आपत्ति
सिसोदिया का कहना है कि पुनरीक्षण कार्यवाही के जरिए ट्रायल कोर्ट के सामने रखे गए सबूतों का दोबारा मूल्यांकन करना सामान्य तौर पर उचित नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि CBI की याचिका में ट्रायल कोर्ट के फैसले की किसी विशिष्ट कानूनी गलती को सामने रखने के बजाय मामले में मौजूद सबूतों और घटनाक्रम को दोबारा पेश करने की कोशिश की गई है।
आवेदन में यह भी कहा गया है कि CBI की याचिका करीब 36 पन्नों की है, जबकि जिस फैसले को चुनौती दी गई है वह 549 पन्नों का है। सिसोदिया के मुताबिक, इस तरह की व्यापक और सामान्य चुनौती के कारण आरोपियों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि उन्हें किन विशिष्ट निष्कर्षों का जवाब देना है।
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17 अगस्त को सुनवाई की संभावना
सिसोदिया ने दिल्ली हाईकोर्ट से CBI Criminal Revision Petition No. 134 of 2026 को सुनवाई योग्य नहीं मानते हुए खारिज करने की मांग की है। साथ ही उन्होंने अदालत से न्यायहित में उचित आदेश पारित करने का अनुरोध किया है।
दायर आवेदन के अनुसार, इस मामले को मुख्य CBI पुनरीक्षण कार्यवाही के साथ 17 अगस्त को सूचीबद्ध किए जाने की संभावना है। CBI की याचिका पर हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई अब इस बात पर भी केंद्रित हो सकती है कि पुनरीक्षण के दायरे में ट्रायल कोर्ट के विस्तृत फैसले की किस सीमा तक समीक्षा की जा सकती है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला दिल्ली की अब रद्द की जा चुकी आबकारी नीति के निर्माण और उसके क्रियान्वयन में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है। CBI ने नीति तैयार करने और लागू करने की प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों की जांच की थी और आरोप लगाया था कि कुछ व्यक्तियों और संस्थाओं को इससे अनुचित लाभ मिला।
हालांकि, अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों से इनकार किया है। फिलहाल दोनों नेताओं की ताजा कानूनी चुनौती का मुख्य मुद्दा आबकारी नीति से जुड़े आरोपों की दोबारा सुनवाई नहीं, बल्कि CBI की याचिका की कानूनी स्वीकार्यता और पुनरीक्षण अधिकार के दायरे से जुड़ा है।
अब दिल्ली हाईकोर्ट इस मामले में केजरीवाल और सिसोदिया की आपत्तियों पर विचार करेगा और तय करेगा कि CBI की ओर से ट्रायल कोर्ट के डिस्चार्ज आदेश को चुनौती देने वाली कार्यवाही किस हद तक आगे बढ़ सकती है।
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