MP OBC Reservation: मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 95 याचिकाएं खारिज
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 27% OBC आरक्षण से जुड़ी 95 याचिकाएं खारिज कर दीं। जानें कोर्ट का फैसला, 14% आरक्षण और नियुक्तियों पर क्या निर्देश दिए गए।
MP OBC Reservation: मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के 27 प्रतिशत आरक्षण को लेकर हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने आरक्षण बढ़ाने के फैसले को चुनौती देने और 27 प्रतिशत आरक्षण लागू रखने की मांग से जुड़ी 95 याचिकाओं का निपटारा करते हुए 2019 में आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने वाले कानून को असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट ने राज्य में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत तक सीमित रखने का फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद सरकारी नौकरियों में आरक्षण और नियुक्तियों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। अदालत ने 13 प्रतिशत आरक्षण के कारण रोके गए पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को तीन महीने के भीतर नियुक्तियां देने का निर्देश भी दिया है। इस मामले में कोर्ट ने आरक्षण की सीमा, पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व और राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए आंकड़ों पर विचार किया।
MP OBC Reservation: हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिकाएं?
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ शामिल थे, ने 159 पन्नों के साझा आदेश में यह फैसला सुनाया। अदालत के अनुसार, राज्य सरकार 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को लागू करने के लिए आवश्यक और पर्याप्त आंकड़े पेश नहीं कर सकी।
कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ और जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल मामलों में निर्धारित सिद्धांतों का उल्लेख किया। इन फैसलों में आरक्षण की सीमा और विशेष परिस्थितियों से जुड़े कानूनी पहलुओं पर विचार किया गया था।
अदालत ने कहा कि आरक्षण की कुल सीमा सामान्य तौर पर 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसे पार करने के लिए असाधारण परिस्थितियों को पर्याप्त साक्ष्यों के साथ स्थापित करना जरूरी है। कोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश सरकार ऐसी परिस्थितियों को साबित नहीं कर पाई। इसी आधार पर 27 प्रतिशत आरक्षण को चुनौती देने और इसे बनाए रखने की मांग वाली याचिकाओं पर फैसला दिया गया।
13 प्रतिशत आरक्षण के तहत रोके गए पदों पर क्या होगा?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में नियुक्तियों को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। अदालत ने 13 प्रतिशत आरक्षण के तहत रोके गए पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को तीन महीने के भीतर नियुक्ति देने को कहा है।
दरअसल, 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को लेकर कानूनी विवाद के चलते कुछ पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया प्रभावित हुई थी। अब अदालत के निर्देश के अनुसार, संबंधित पदों पर नियुक्ति की कार्रवाई निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरी की जानी है।
इस आदेश का असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ सकता है, जो लंबे समय से भर्ती प्रक्रिया और नियुक्तियों को लेकर इंतजार कर रहे थे। हालांकि, संबंधित भर्तियों में नियुक्ति की वास्तविक प्रक्रिया और पात्रता का निर्धारण लागू नियमों तथा अदालत के आदेश के अनुसार किया जाएगा।
महाजन आयोग की रिपोर्ट पर कोर्ट ने क्या कहा?
ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के समर्थन में राज्य सरकार ने महाजन आयोग की 1982 की रिपोर्ट का हवाला दिया था। हालांकि, अदालत ने आरक्षण बढ़ाने के लिए समकालीन, वैज्ञानिक और मात्रात्मक आंकड़ों की आवश्यकता पर जोर दिया।
कोर्ट के अनुसार, किसी समुदाय की आबादी अधिक होने के आधार पर ही आरक्षण बढ़ाने का निर्णय नहीं लिया जा सकता। इसके लिए संबंधित वर्ग के सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के साथ सरकारी सेवाओं और उच्च शिक्षा में उसके प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रासंगिक आंकड़ों का मूल्यांकन जरूरी है।
अदालत ने इसी संदर्भ में राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत सामग्री पर विचार किया और पाया कि 27 प्रतिशत आरक्षण को उचित ठहराने के लिए आवश्यक आधार पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं किए गए थे।
2019 में कमलनाथ सरकार ने बढ़ाया था आरक्षण
मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण का विवाद वर्ष 2019 में शुरू हुआ था। तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की सीमा 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दी थी।
इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई, जिसके बाद मामला लंबी कानूनी प्रक्रिया में चला गया। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इस विषय पर सुनवाई हुई। ओबीसी वर्ग की ओर से पेश वकीलों ने आरक्षण को 27 प्रतिशत बनाए रखने की मांग की थी।
also read:- Permanent Labor Certification: अमेरिका ने 8 IT कंपनियों…
हालांकि, अब हाईकोर्ट ने 2019 के कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है। फैसले के बाद राज्य में ओबीसी आरक्षण की सीमा 14 प्रतिशत रखने का निर्देश सामने आया है।
हाईकोर्ट के फैसले पर कमलनाथ ने बीजेपी को घेरा
फैसले के बाद मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बीजेपी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर आरोप लगाया कि राज्य सरकार की कमजोर पैरवी और अधूरी जानकारी के कारण ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया।
कमलनाथ ने कहा कि 2019 में उनकी सरकार ने ओबीसी आरक्षण को बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया था। उनके मुताबिक, बीजेपी सरकार शुरू से ही इस आरक्षण के खिलाफ रही है और अदालत में प्रभावी तरीके से पक्ष नहीं रख सकी।
उन्होंने अपने बयान में यह भी कहा कि ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दिलाने के लिए उनकी लड़ाई जारी रहेगी। कमलनाथ ने फैसले को ओबीसी समुदाय के साथ अन्याय बताते हुए इस मुद्दे पर आगे भी संघर्ष करने की बात कही।
हालांकि, कमलनाथ के ये आरोप राजनीतिक प्रतिक्रिया का हिस्सा हैं। अदालत के आदेश में आरक्षण बढ़ाने के समर्थन में पर्याप्त आंकड़े और असाधारण परिस्थितियां स्थापित नहीं होने को फैसले का आधार बताया गया है।
MP OBC Reservation: आगे क्या होगा?
मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर हाईकोर्ट के फैसले का असर सरकारी भर्तियों और आरक्षण से जुड़े मामलों पर पड़ सकता है। खास तौर पर 13 प्रतिशत आरक्षण के तहत रोके गए पदों पर तीन महीने में नियुक्तियां देने का निर्देश अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है।
वहीं, 27 प्रतिशत आरक्षण को बहाल करने की मांग करने वाले पक्ष के लिए यह फैसला एक बड़ी कानूनी चुनौती है। आगे की स्थिति संबंधित पक्षों की कानूनी कार्रवाई और आदेश के क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।
फिलहाल, हाईकोर्ट ने 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को लागू करने के समर्थन में दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए 14 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को बरकरार रखा है। इस फैसले के बाद मध्य प्रदेश में आरक्षण और सरकारी नियुक्तियों से जुड़े घटनाक्रम पर सबकी नजर रहेगी।
For English News: http://newz24india.in
Visit WhatsApp Channel: https://whatsapp.com/channel/0029Vb4ZuKSLSmbVWNb1sx1x



