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वट सावित्री व्रत 2026: बरगद पूजा में न करें ये गलतियां, वरना टूट सकता है व्रत का फल

वट सावित्री व्रत 2026 की सही पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और बरगद पूजा में होने वाली गलतियों से बचने के उपाय यहां जानें पूरी जानकारी।

वट सावित्री व्रत 2026 हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। यह व्रत पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की स्थिरता के लिए रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट वृक्ष में त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है, इसलिए इसकी पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। लेकिन वट सावित्री व्रत 2026 के दौरान बरगद पूजा में की गई छोटी-सी गलती भी व्रत के पूर्ण फल को प्रभावित कर सकती है।

वट सावित्री व्रत 2026 का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, वट सावित्री व्रत 2026 का आयोजन 16 मई को किया जाएगा। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04 बजकर 07 मिनट से 04 बजकर 48 मिनट तक रहेगा। वहीं, विजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 04 मिनट से 03 बजकर 28 मिनट तक रहेगा। इसी अवधि में पूजा करना अत्यंत शुभ माना गया है।

बरगद पूजा में न करें ये गलतियां

वट सावित्री व्रत 2026 में वट वृक्ष की पूजा करते समय कुछ नियमों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सबसे बड़ी गलती वृक्ष की टहनियां तोड़ना है, जिसे शास्त्रों में पाप माना गया है। यदि प्राकृतिक वट वृक्ष उपलब्ध न हो, तो उसके चित्र या छोटे पौधे की पूजा की जा सकती है।

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इसके अलावा, वट सावित्री व्रत 2026 में परिक्रमा करते समय सूत को हमेशा घड़ी की दिशा में ही बांधना चाहिए। उल्टी दिशा में परिक्रमा करना अशुभ माना जाता है और इससे पूजा का प्रभाव कम हो सकता है।

व्रत के दौरान वस्त्र और शुद्धता का ध्यान

वट सावित्री व्रत 2026 के दिन काले या नीले रंग के वस्त्र पहनना वर्जित माना गया है। सुहागिन महिलाओं को लाल, पीले या नारंगी रंग के वस्त्र पहनने चाहिए। पूजा में बासी फूल, गंदा जल या अशुद्ध सामग्री का प्रयोग करने से बचना चाहिए।

कथा सुनना और व्रत का पालन

वट सावित्री व्रत 2026 का पूरा फल तभी मिलता है जब सावित्री और सत्यवान की कथा श्रद्धा पूर्वक सुनी जाए। कथा के बीच में उठना या ध्यान भटकाना व्रत के संकल्प को कमजोर कर सकता है। इसलिए पूरे मन से कथा श्रवण करना आवश्यक है।

दान और आशीर्वाद का महत्व

वट सावित्री व्रत 2026 के समापन पर चने, फल, वस्त्र आदि का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही बड़ों का आशीर्वाद लेना भी जरूरी होता है। विशेष रूप से सास का आशीर्वाद लिए बिना व्रत अधूरा माना जाता है।

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