केंद्रीय बजट 2026 के बाद सिगरेट और शराब की कीमतें बढ़ीं। उपभोक्ताओं को कितना अधिक भुगतान करना होगा और इसका असर क्या होगा, जानें।
सिगरेट और शराब की कीमतें: केंद्रीय बजट 2026–27 ने भारत में तंबाकू उत्पादों पर कर संरचना में बड़े बदलाव किए हैं, जिसके परिणामस्वरूप सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों की कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई है। नया नियम 1 फरवरी 2026 से लागू हो गया है और यह 2017 से लागू जीएसटी + मुआवजा शुल्क प्रणाली को बदल देता है।
अब सिगरेट और शराब, अन्य तंबाकू उत्पाद लगभग 40 प्रतिशत की उच्च GST दर के अधीन होंगे, साथ ही नई उत्पाद शुल्क और स्वास्थ्य- एवं सुरक्षा- आधारित अतिरिक्त लेवी भी लागू की गई हैं। इन परिवर्तनों के कारण रिटेल कीमतों में तेज बढ़ोतरी की संभावना है, खासकर मध्यम और प्रीमियम श्रेणी में।
सरकार का एंटी-तंबाकू अभियान
सरकार का कहना है कि यह कदम सार्वजनिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। विशेष रूप से युवाओं में धूम्रपान को कम करने के उद्देश्य से यह कर नीति तैयार की गई है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार, नई कर संरचना लागू होने के बाद सिगरेट की कीमतों में काफी वृद्धि हो सकती है।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि उच्च कीमतें धूम्रपान रोकने में प्रभावी साबित होती हैं और इससे स्वास्थ्य संबंधी खर्चों में दीर्घकालिक कमी आएगी। साथ ही, इससे कर संग्रह में भी सुधार होने की संभावना है।
शराब की कीमतों में भी वृद्धि की संभावना
हालांकि शराब की कीमतों का नियंत्रण राज्य सरकारों के पास है, लेकिन केंद्रीय बजट ने सिन-गुड्स (हानिकारक वस्तुओं) पर कर नीतियों को कड़ा करने का संकेत दिया है। अप्रत्यक्ष कर और अनुपालन लागत में बदलाव से कई राज्यों में शराब की कीमतों में वृद्धि की संभावना है।
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विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही राष्ट्रीय स्तर पर कोई uniform hike नहीं है, लेकिन विभिन्न राज्यों में कीमतों पर असर दिखाई दे सकता है, खासकर शहरी क्षेत्रों में।
उपभोक्ताओं के लिए बढ़ेगा खर्च
इस बजट के बदलाव से नियमित सिगरेट और शराब उपभोक्ताओं पर तत्काल असर पड़ेगा। प्रति यूनिट कीमत में वृद्धि मासिक खर्च को बढ़ा सकती है। नीति निर्माताओं का कहना है कि उच्च कीमतों से खपत में कमी आएगी और राजस्व संग्रह संतुलित रहेगा।
बजट 2026 का संदेश
केंद्रीय बजट 2026–27 ने सिगरेट और शराब की कीमतों में बदलाव के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार सिन-गुड्स पर कर के जरिए सार्वजनिक स्वास्थ्य और वित्तीय संतुलन दोनों सुनिश्चित करना चाहती है। उपभोक्ताओं को अब अधिक खर्च करने की तैयारी करनी होगी, जबकि सरकार का लक्ष्य स्वास्थ्य और कर संग्रह को बढ़ाना है।
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