दिल्ली शराब नीति मामला: कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को बरी किया, CBI की जांच पद्धति पर अदालत ने जताई आपत्ति।
दिल्ली: दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने शुक्रवार को बहुचर्चित दिल्ली शराब नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत कुल 23 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि मामले में प्रथम दृष्टया कोई आपराधिक षड्यंत्र या भ्रष्टाचार का ठोस प्रमाण नहीं मिला।
कोर्ट के फैसले के बाद अरविंद केजरीवाल भावुक हो गए और मीडिया से कहा, “मैं भ्रष्ट नहीं हूं। सच की हमेशा जीत होती है।” उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल ने भी कहा कि सत्य हमेशा विजयी होता है।
विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने अपने आदेश में सीबीआई की जांच पद्धति पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि आरोपी को अप्रूवर बनाकर केवल उसके बयानों पर निर्भर रहना उचित नहीं था और यह संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है।
दिल्ली शराब नीति मामले का इतिहास
दिल्ली शराब नीति 2021-22 कोरोना काल के दौरान लागू की गई थी, जिसे लागू करते समय कथित अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं। इसके बाद उपराज्यपाल ने सीबीआई जांच की सिफारिश की। इस नीति के तहत शराब लाइसेंस फीस में कटौती और लाभांश तय करने के आरोप लगे थे, जिससे कुछ निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने और दिल्ली सरकार को आर्थिक हानि पहुँचाने का दावा किया गया।
आख़िर में अधर्म और अन्याय हारता है और सच ही जीतता है।
सत्यमेव जयते pic.twitter.com/GZghEdhJf3
— Arvind Kejriwal (@ArvindKejriwal) February 27, 2026
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अगस्त 2022 में सीबीआई ने 15 आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। बाद में ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले के तहत इस मामले की अलग जांच शुरू की।
सीबीआई की जांच मुख्य रूप से नीति बनाने में कथित अनियमितताओं पर केंद्रित थी, जबकि ईडी ने धन शोधन और मनी लॉन्ड्रिंग पर ध्यान केंद्रित किया।
कोर्ट के फैसले का असर
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नीति बनाने में कोई बड़ा षड्यंत्र या अपराध नहीं पाया गया। अदालत ने कहा कि सीबीआई ने केवल अनुमान और बयानों के आधार पर आरोप लगाए, जबकि कोई ठोस सबूत नहीं था।
इस फैसले से AAP नेताओं के राजनीतिक और कानूनी संकट में राहत मिली है। हालांकि, मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अरविंद केजरीवाल को अभी कोई राहत नहीं मिली है।
विशेष न्यायाधीश ने यह भी कहा कि ‘साउथ ग्रुप’ शब्द का इस्तेमाल जांच में संदिग्ध तरीके से किया गया और इसे दोषियों को जोड़ने के लिए आधार नहीं बनाया जा सकता।
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