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गांधारी मूवी रिव्यू: तापसी पन्नू के एक्शन में दम, लेकिन मां-बेटी की कहानी क्यों नहीं छू पाई दिल?

गांधारी मूवी रिव्यू: तापसी पन्नू के दमदार एक्शन के बावजूद मां-बेटी की कहानी भावनात्मक असर छोड़ने में क्यों रह गई पीछे, जानें पूरा रिव्यू।

गांधारी एक ऐसी फिल्म है जिसका कॉन्सेप्ट पहली नजर में काफी दिलचस्प लगता है। एक मां अपनी अपहृत बेटी को तलाशने के लिए हर मुश्किल से लड़ती है। कहानी में चाइल्ड ट्रैफिकिंग, रहस्य, बदला और जबरदस्त एक्शन को शामिल किया गया है। तापसी पन्नू मुख्य भूमिका में हैं और फिल्म में उनका एक्शन अवतार खास ध्यान खींचता है।

फिल्म का नाम महाभारत की गांधारी से प्रेरित नजर आता है। हालांकि यहां आंखों पर पट्टी बांधने के बजाय अंधेरे और रोशनी का इस्तेमाल कहानी के भावनात्मक और प्रतीकात्मक पहलू के तौर पर किया गया है।

क्या है ‘गांधारी’ की कहानी?

फिल्म की कहानी बानी (तापसी पन्नू), उसके पति गोकुल और उनकी छह साल की बेटी मिश्ती के इर्द-गिर्द घूमती है। एक सफर के दौरान मिश्ती अचानक गायब हो जाती है। बच्ची को खोजने की कोशिश में बानी पर हमला होता है और उसकी आंख के पास गंभीर चोट लगती है।

इस चोट के कारण कुछ समय के लिए उसकी आंखों की रोशनी चली जाती है। लेकिन बेटी को खोजने का जुनून उसे रुकने नहीं देता।

जांच आगे बढ़ने पर पता चलता है कि जिस इलाके में मिश्ती गायब हुई है, वहां बच्चों के गायब होने के पीछे एक संगठित नेटवर्क हो सकता है। इसके बाद कहानी चाइल्ड ट्रैफिकिंग और रहस्यमयी शहर जॉयपुर्रा की तरफ बढ़ती है।

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तापसी पन्नू का एक्शन सबसे मजबूत पक्ष

गांधारी में तापसी पन्नू एक बार फिर एक्शन करती नजर आती हैं। इससे पहले भी वह ‘बेबी’ और ‘नाम शबाना’ जैसी फिल्मों में एक्शन भूमिकाएं निभा चुकी हैं।

इस फिल्म में भी फाइट सीक्वेंस में उनका आत्मविश्वास साफ दिखाई देता है। बानी के किरदार को शारीरिक रूप से मजबूत दिखाने में तापसी प्रभावी लगती हैं। कई एक्शन सीन फिल्म के सबसे मनोरंजक हिस्सों में शामिल हैं।

हालांकि समस्या तब पैदा होती है जब किरदार को सिर्फ एक्शन हीरो नहीं, बल्कि अपनी बेटी को खो चुकी मां के रूप में भी दर्शकों से जुड़ना होता है। कई जगह तापसी की एक्शन वाली छवि बानी के भावनात्मक पक्ष पर भारी पड़ती दिखाई देती है।

मां-बेटी का रिश्ता क्यों कमजोर लगा?

फिल्म की सबसे बड़ी कमी बानी और मिश्ती के रिश्ते को लेकर महसूस होती है। पूरी कहानी मिश्ती के अपहरण से शुरू होती है, लेकिन मां-बेटी के रिश्ते को पर्याप्त गहराई नहीं मिलती।

यही वजह है कि बानी जब अपनी बेटी की तलाश में खतरों का सामना करती है, तो दर्शक उसकी बेचैनी को उतनी तीव्रता से महसूस नहीं कर पाते, जितनी इस कहानी से उम्मीद की जाती है।

अगर फिल्म शुरुआत में बानी और मिश्ती के रिश्ते को ज्यादा मजबूत तरीके से स्थापित करती, तो आगे के एक्शन और संघर्ष का भावनात्मक असर कहीं अधिक हो सकता था।

बाकी कलाकारों का प्रदर्शन

इश्कवाक सिंह ने गोकुल का किरदार निभाया है। वह अपने हिस्से में ठीक लगते हैं, लेकिन उनका किरदार बानी की तुलना में ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाता। पिता की बेटी के लिए चिंता को कहानी में पर्याप्त भावनात्मक विस्तार नहीं दिया गया है।

मीता वशिष्ठ झुनू अंबा के किरदार में प्रभाव छोड़ती हैं। उनके अभिनय में रहस्य और गंभीरता दोनों दिखाई देती हैं। छाया कदम भी अपने किरदार में ध्यान खींचती हैं।

जतिन सरना, चंदन रॉय, स्वास्तिका मुखर्जी और प्रशांत नारायणन जैसे कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय किया है, लेकिन पटकथा उन्हें ज्यादा खुलने का मौका नहीं देती।

जॉयपुर्रा का माहौल बनाता है अलग पहचान

गांधारी का सबसे दिलचस्प पहलू इसका वातावरण है। देवाशीष मखीजा ने जॉयपुर्रा को एक ऐसे काल्पनिक शहर के रूप में पेश किया है, जहां गलियां, सुरंगें, बहुरुपिए, रंग-बिरंगे चेहरे और रहस्यमयी धार्मिक गतिविधियां कहानी में एक अलग तरह की बेचैनी पैदा करती हैं।

बानी की आंखों की समस्या को कहानी के साथ जोड़ना भी एक अच्छा विचार है। लेकिन कई जगह फिल्म का फोकस मुख्य कहानी से हटकर दूसरी चीजों की ओर चला जाता है।

पटकथा में है सबसे बड़ी कमी

कनिका ढिल्लों की कहानी और पटकथा में कई अच्छे आइडिया मौजूद हैं। चाइल्ड ट्रैफिकिंग, मां की तलाश, पुलिस जांच, बानी का अतीत और जॉयपुर्रा की रहस्यमयी दुनिया एक साथ कहानी का हिस्सा बनती है।

शुरुआत में ये सभी चीजें दिलचस्प लगती हैं, लेकिन आगे चलकर कहानी कुछ जगह बिखरती हुई महसूस होती है। लंबे संवाद और फ्लैशबैक कहानी की रफ्तार को प्रभावित करते हैं।

कुछ रहस्यों को दिखाने के बजाय संवादों के जरिए समझाया जाता है, जिससे सस्पेंस का असर कम हो जाता है। कई एक्शन सीक्वेंस भी जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं और कहानी का तनाव कमजोर कर देते हैं।

‘गांधारी’ नाम कितना सही है?

फिल्म का टाइटल महाभारत की गांधारी से एक प्रतीकात्मक संबंध बनाने की कोशिश करता है। महाभारत में गांधारी ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी, जबकि यहां बानी की आंखों का अंधेरा उसकी बेटी तक पहुंचने की कहानी का हिस्सा बनता है।

कांसेप्ट दिलचस्प है, लेकिन फिल्म इस समानता को ज्यादा गहराई से विकसित नहीं कर पाती। अगर इस प्रतीक को कहानी के साथ और मजबूती से जोड़ा जाता, तो फिल्म का शीर्षक ज्यादा प्रभावशाली बन सकता था।

देखें या नहीं?

गांधारी उन फिल्मों में शामिल है जिनका आइडिया काफी आकर्षक है, लेकिन उसका पूरा प्रभाव पर्दे पर नहीं बन पाता। तापसी पन्नू का एक्शन मजबूत है और जॉयपुर्रा की रहस्यमयी दुनिया फिल्म को अलग लुक देती है।

लेकिन मां-बेटी के रिश्ते में भावनात्मक गहराई की कमी, बिखरी हुई पटकथा और कुछ लंबे एक्शन सीक्वेंस फिल्म की कमजोरियां बन जाते हैं।

अगर आप तापसी पन्नू के एक्शन अवतार के फैन हैं, तो गांधारी आपको कुछ हद तक पसंद आ सकती है। लेकिन अगर आप एक ऐसी भावनात्मक कहानी की उम्मीद कर रहे हैं जिसमें मां का दर्द और बेटी की तलाश आपको अंदर तक महसूस हो, तो फिल्म निराश कर सकती है।

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