कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर: साड़ी, गजरा और चूड़ियां पहनकर ही मंदिर में जाते हैं पुरुष, जानिए केरल के इस अनोखे मंदिर की परंपरा
केरल के कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर में पुरुष श्रद्धालु साड़ी, गजरा और आभूषण पहनकर देवी के दर्शन करते हैं। जानें इस अनोखी परंपरा की कहानी।
भारत अपनी विविध संस्कृतियों, धार्मिक मान्यताओं और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए जाना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में पूजा-पाठ से जुड़ी ऐसी कई परंपराएं देखने को मिलती हैं, जो लोगों को हैरान कर देती हैं। केरल का कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर भी ऐसी ही अनोखी धार्मिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है, जहां पुरुष श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए महिलाओं की तरह सजकर पहुंचते हैं।
यहां पुरुष भक्त साड़ी पहनते हैं, मेकअप करते हैं, चूड़ियां पहनते हैं और बालों में गजरा सजाते हैं। धार्मिक आस्था से जुड़ी यह परंपरा खास तौर पर मंदिर में आयोजित होने वाले चमायाविलक्कू उत्सव के दौरान देखने को मिलती है।
महिलाओं की तरह सजकर देवी के दर्शन करते हैं पुरुष
कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर में चमायाविलक्कू उत्सव के दौरान पुरुष श्रद्धालु पारंपरिक महिला वेशभूषा में तैयार होकर देवी की पूजा करते हैं। इसके लिए वे साड़ी पहनने के साथ-साथ आभूषण, चूड़ियां और फूलों की माला भी धारण करते हैं।
कई भक्त अपने चेहरे पर पारंपरिक मेकअप भी करवाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को केवल सजने-संवरने के तौर पर नहीं देखा जाता, बल्कि श्रद्धालु इसे देवी के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण का हिस्सा मानते हैं।
मंदिर के बाहर लगते हैं मेकअप स्टॉल
उत्सव के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने के कारण मंदिर परिसर के आसपास विशेष तैयारियां की जाती हैं। पुरुष भक्तों को महिला रूप में तैयार करने के लिए अस्थायी मेकअप और सजावट के स्टॉल लगाए जाते हैं।
इन जगहों पर मेकअप आर्टिस्ट श्रद्धालुओं को साड़ी पहनाने, मेकअप करने और पारंपरिक आभूषणों से सजाने में मदद करते हैं। इसके बाद भक्त पूरी श्रद्धा के साथ देवी के दर्शन के लिए मंदिर की ओर जाते हैं।
चमायाविलक्कू उत्सव है खास
कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर में होने वाला चमायाविलक्कू उत्सव इस अनोखी परंपरा का सबसे प्रमुख अवसर माना जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं।
इस उत्सव की खासियत यह है कि पुरुष श्रद्धालु महिलाओं के पारंपरिक रूप में सजकर देवी की आराधना करते हैं। साड़ी, गहने, चूड़ियां और गजरा इस विशेष रूप का अहम हिस्सा होते हैं।
also read:- कामिका एकादशी 2026: 8 या 9 अगस्त? जानें सही तारीख, शुभ…
चरवाहों से जुड़ी है इस परंपरा की लोककथा
इस परंपरा के पीछे एक स्थानीय लोककथा भी प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, बहुत समय पहले कुछ चरवाहे लड़के महिलाओं के वेश में देवी की पूजा किया करते थे।
कहा जाता है कि उनकी सच्ची और सरल भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें दर्शन दिए और आशीर्वाद दिया। इसी लोकविश्वास को इस अनोखी परंपरा की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है।
हालांकि, यह कथा धार्मिक और स्थानीय मान्यता का हिस्सा है। इसके ऐतिहासिक प्रमाणों को अलग से देखा जाना चाहिए।
मनोकामना पूरी होने की मान्यता
कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं की देवी के प्रति गहरी आस्था है। भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से देवी की पूजा और इस परंपरा का पालन करने से उनकी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं।
कई श्रद्धालु नौकरी, विवाह, परिवार, संतान, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि जैसी इच्छाओं के लिए देवी से प्रार्थना करते हैं। यही आस्था हर साल बड़ी संख्या में भक्तों को इस उत्सव से जोड़ती है।
भक्ति और परंपरा का अनोखा संगम
कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर की यह परंपरा भारतीय धार्मिक संस्कृति में विविधता की एक खास मिसाल पेश करती है। पुरुष श्रद्धालुओं का महिला रूप धारण कर देवी की पूजा करना इस धार्मिक आयोजन को बाकी मंदिर परंपराओं से अलग बनाता है।
यहां साड़ी, मेकअप और गहने केवल बाहरी सजावट नहीं, बल्कि भक्तों के लिए श्रद्धा और समर्पण का माध्यम हैं। यही वजह है कि चमायाविलक्कू उत्सव के दौरान इस परंपरा को निभाने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
For English News: http://newz24india.in
Visit WhatsApp Channel: https://whatsapp.com/channel/0029Vb4ZuKSLSmbVWNb1sx1x



