पीएम मोदी की डिग्री मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय को हाईकोर्ट से मिली राहत, तीन सप्ताह का समय
दिल्ली हाईकोर्ट ने पीएम मोदी की डिग्री मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय को तीन सप्ताह का समय दिया। DU का कहना है कि जानकारी मांगना केवल सनसनी फैलाने के लिए है। अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री से जुड़े मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) को दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को राहत दी है। कोर्ट ने विश्वविद्यालय को अपील दाखिल करने में हुई देरी पर आपत्ति दर्ज करने और मुख्य मामले में जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है। अगली सुनवाई 27 अप्रैल 2026 को होगी।
दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया शामिल थे, ने कहा कि देरी माफ करने से संबंधित आवेदन पर आपत्ति दाखिल करने के लिए डीयू को तीन सप्ताह का समय दिया जाता है।
DU की ओर से सॉलिसिटर जनरल का जवाब
दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में दलील दी कि पीएम मोदी की डिग्री से जुड़ी जानकारी की मांग केवल सनसनी फैलाने के उद्देश्य से की जा रही है। उन्होंने कहा कि इस मामले में कोई ठोस तथ्य नहीं है और विश्वविद्यालय को समय दिया जाना चाहिए ताकि वह अपनी अपील में देरी और मामले के गुण-दोष पर उचित जवाब दाखिल कर सके।
अपीलकर्ताओं का तर्क
अपीलकर्ताओं में आरटीआई कार्यकर्ता नीरज, आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता संजय सिंह और अधिवक्ता मोहम्मद इरशाद शामिल हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि डीयू ने करीब ढाई महीने बीत जाने के बावजूद देरी पर आपत्ति दाखिल नहीं की है। उनका तर्क था कि यह देरी केवल 15 से 45 दिन की है, जिसे अदालत आसानी से माफ कर सकती है। साथ ही उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि यदि दिल्ली विश्वविद्यालय मुख्य अपील पर जवाब देना चाहता है, तो औपचारिक नोटिस जारी किया जाए।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि नोटिस केवल सनसनी फैलाने के लिए जारी नहीं किया जा सकता और अदालत में मामले के तथ्यों के आधार पर निर्णय होना चाहिए।
मामले का पूरा विवरण
यह अपील उस एकल न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ दायर की गई है, जिसने 25 अगस्त 2025 को केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के आदेश को रद्द किया था। उस आदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक डिग्री से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि किसी भी व्यक्ति की सभी व्यक्तिगत जानकारियां सार्वजनिक नहीं की जा सकतीं, भले ही वह सार्वजनिक पद पर हो। न्यायाधीश ने कहा कि आरटीआई कानून का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना है, न कि सनसनी फैलाना। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी सार्वजनिक पद के लिए शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य होती, तो स्थिति अलग होती।
उल्लेखनीय है कि इसी फैसले में हाईकोर्ट ने पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के कक्षा 10 और 12 के सीबीएसई रिकॉर्ड सार्वजनिक करने के आदेश को भी रद्द कर दिया था।
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