धर्म

जगन्नाथ रथ यात्रा 2026: स्नान पूर्णिमा पर क्यों धारण करते हैं भगवान जगन्नाथ गज (हाथी) वेश? जानें धार्मिक रहस्य

स्नान पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ का गज वेश क्यों धारण होता है? जानें इसकी पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी जानकारी।

भगवान जगन्नाथ की लीलाएं सदियों से भक्तों के लिए आस्था, रहस्य और भक्ति का अद्भुत संगम रही हैं। इन्हीं दिव्य परंपराओं में से एक है स्नान पूर्णिमा पर किया जाने वाला विशेष गज वेश (हाथी स्वरूप), जिसे लेकर श्रद्धालुओं में गहरी श्रद्धा और जिज्ञासा देखने को मिलती है। यह परंपरा आगामी जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 से पहले भी विशेष महत्व रखती है।

स्नान पूर्णिमा पर होता है भव्य अभिषेक

पुरी स्थित श्री मंदिर में स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को स्नान मंडप में लाया जाता है। यहां 108 पवित्र कलशों के जल से उनका महाअभिषेक किया जाता है। यह दिव्य स्नान हर वर्ष जगन्नाथ रथ यात्रा से पहले एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है।

क्या है गज वेश की परंपरा?

महाअभिषेक के बाद भगवानों को विशेष रूप से सजाया जाता है, जिसे गज वेश या हाथी वेश कहा जाता है।

भगवान जगन्नाथ और भगवान बलभद्र को हाथी के मुख जैसे स्वरूप में सजाया जाता है
देवी सुभद्रा को कमल स्वरूप में श्रृंगारित किया जाता है

यह अद्भुत श्रृंगार भक्तों के लिए अत्यंत आकर्षण का केंद्र होता है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।

गज वेश से जुड़ी पौराणिक कथा

परंपरा के पीछे एक प्रसिद्ध कथा जुड़ी है। कहा जाता है कि 15वीं शताब्दी में भगवान गणेश के परम भक्त गणपति भट्ट पुरी आए थे। वे स्नान यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ में गणेश स्वरूप देखने की इच्छा रखते थे, लेकिन ऐसा न होने पर वे निराश हो गए।

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उनकी सच्ची भक्ति को देखते हुए भगवान जगन्नाथ ने उन्हें दिव्य दर्शन दिए। अगले दर्शन में भगवान ने गज स्वरूप धारण किया—जहां:

  • भगवान जगन्नाथ काले गजानन रूप में प्रकट हुए
  • भगवान बलभद्र श्वेत गजानन रूप में दिखे
  • देवी सुभद्रा कमल स्वरूप में दर्शन देने लगीं

इस दिव्य दृश्य ने भक्त गणपति भट्ट को यह अनुभूति कराई कि ईश्वर एक ही परम शक्ति हैं, जो भक्त की भावना के अनुसार किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं।

गज वेश का आध्यात्मिक संदेश

गज वेश केवल एक धार्मिक श्रृंगार नहीं, बल्कि भक्ति और दर्शन का गहरा संदेश देता है कि ईश्वर किसी एक रूप तक सीमित नहीं हैं। भगवान अपने भक्तों की भावना के अनुसार स्वयं को प्रकट करते हैं। इसी कारण उन्हें ‘भक्तवत्सल’ कहा जाता है।

आज भी जीवित है यह परंपरा

आज भी पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में स्नान पूर्णिमा के अवसर पर यह परंपरा पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से निभाई जाती है। यह आयोजन जगन्नाथ रथ यात्रा से पहले सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक घटनाओं में से एक माना जाता है, जो भक्तों के लिए आध्यात्मिक अनुभव का प्रतीक है।

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