धर्म

सावन 2026: शिवलिंग की आधी परिक्रमा क्यों होती है और शिव पूजा में शंख क्यों वर्जित है? जानिए

जानिए सावन 2026 में शिवलिंग की आधी परिक्रमा करने का कारण और शिव पूजा में शंख के उपयोग को क्यों वर्जित माना गया है। इसके पीछे छिपे धार्मिक और शास्त्रीय रहस्य।

सावन 2026: सावन मास भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस दौरान शिवभक्त पूरी श्रद्धा से शिव पूजा करते हैं, लेकिन इससे जुड़े कुछ नियम और परंपराएं विशेष महत्व रखती हैं। इनमें शिवलिंग की आधी परिक्रमा और शिव पूजा में शंख के उपयोग का निषेध प्रमुख हैं।

शिवलिंग की आधी परिक्रमा क्यों की जाती है?

शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग की पूर्ण परिक्रमा नहीं की जाती बल्कि आधी परिक्रमा का विधान है। इसका कारण शिवलिंग की संरचना और उससे जुड़ी आध्यात्मिक मान्यताएं हैं।

मान्यता है कि शिवलिंग का निचला भाग ब्रह्मा, मध्य भाग विष्णु और ऊपरी भाग रुद्र स्वरूप का प्रतीक है। वहीं जल निकलने का स्थान, जिसे गौमुख कहा जाता है, विशेष ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।

धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि परिक्रमा करते समय गौमुख को पार नहीं किया जाता। इसलिए भक्त वहां तक जाकर वापस लौटते हैं और इसी तरह परिक्रमा पूरी मानी जाती है।

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परिक्रमा करने की सही विधि

शिवलिंग की परिक्रमा वाम दिशा से शुरू की जाती है। भक्त गौमुख तक पहुंचकर रुकते हैं और फिर पीछे मुड़कर उसी रास्ते से वापस लौटते हैं। दूसरी ओर जाकर पुनः गौमुख के पास आकर परिक्रमा पूरी की जाती है।

शिव पूजा में शंख का उपयोग क्यों नहीं होता?

शंख हिंदू धर्म में पवित्र माना जाता है और अधिकतर पूजा-पाठ में इसका उपयोग शुभ होता है, लेकिन शिव पूजा में शंख से जल अर्पित करना वर्जित माना गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शंख का संबंध एक असुर के शरीर से जुड़ा बताया जाता है, जिसे भगवान विष्णु ने पराजित किया था। इसी कारण कुछ ग्रंथों में इसे शिव पूजा में निषिद्ध माना गया है।

इसके अलावा शंख का संबंध भगवान विष्णु की वैष्णव परंपरा से अधिक जुड़ा हुआ माना जाता है, जबकि शिव पूजा का स्वरूप ध्यान, तपस्या और मौन साधना पर आधारित होता है।

शिव पूजा का आध्यात्मिक स्वरूप

शंखध्वनि को उत्सव और विजय का प्रतीक माना जाता है, जबकि भगवान शिव को वैराग्य और योग का देवता कहा गया है। इसलिए शिव आराधना में शांत वातावरण, एकाग्रता और साधना को अधिक महत्व दिया जाता है।

इसी कारण शिवलिंग पर जल, दूध और पंचामृत अर्पित करने की परंपरा प्रचलित है, जबकि शंख का उपयोग सामान्यतः नहीं किया जाता।

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