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सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली में पीजी सुरक्षा नीति की तैयारी, पुराने भवनों का होगा स्ट्रक्चरल ऑडिट

सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली सरकार नई पीजी सुरक्षा नीति की तैयारी में है। पुराने भवनों के स्ट्रक्चरल ऑडिट और सुरक्षा प्रमाणन पर जोर रहेगा।

पीजी सुरक्षा नीति: सत्य निकेतन में पीजी के तौर पर इस्तेमाल की जा रही इमारत के ढहने की घटना के बाद दिल्ली में पेइंग गेस्ट (PG) आवासों की सुरक्षा और नियमन को लेकर सरकार ने नई पहल शुरू की है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने संकेत दिया है कि सरकार जल्द ऐसी व्यवस्था तैयार करने पर काम कर रही है, जिसमें पुराने भवनों को पीजी, नर्सिंग होम, स्कूल या अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करने से पहले उनकी संरचनात्मक सुरक्षा की जांच जरूरी होगी।

प्रस्तावित पीजी सुरक्षा नीति के तहत पुराने भवनों के मालिकों को स्ट्रक्चरल ऑडिट रिपोर्ट जमा करनी पड़ सकती है। इसके साथ ही भवन की सुरक्षा प्रमाणित कराने की व्यवस्था भी लागू किए जाने की योजना है। सरकार का यह कदम सत्य निकेतन हादसे के बाद सामने आया है, लेकिन दिल्ली में पीजी को व्यवस्थित तरीके से नियंत्रित करने की कोशिश कोई नई बात नहीं है।

1993 से जारी है PG को रेगुलेट करने की कोशिश| पीजी सुरक्षा नीति

दिल्ली में पीजी आवासों को लेकर नियमन की शुरुआत तीन दशक से भी पहले हो चुकी थी। दिल्ली हाईकोर्ट के 2006 के एक फैसले में वर्ष 1993 में लागू की गई केंद्र सरकार की ‘पेइंग गेस्ट आवास योजना’ का उल्लेख किया गया था।

इस योजना का मूल उद्देश्य देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को साफ-सुथरी और किफायती रहने की सुविधा उपलब्ध कराना था। योजना के तहत आवासीय भवनों में पेइंग गेस्ट रखने की अनुमति दी गई थी, लेकिन एक महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि मकान मालिक भी उसी भवन में रहता हो।

बाद में दिल्ली सरकार ने वर्ष 2000 में अपनी पेइंग गेस्ट आवास योजना को मंजूरी दी। इसके तहत मकान मालिकों को दिल्ली पर्यटन विभाग में पंजीकरण कराना होता था। साथ ही पीजी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कमरों और बेड की संख्या पर भी सीमा तय की गई थी।

बदलते समय के साथ बढ़ता गया PG कारोबार

पुरानी व्यवस्था मुख्य रूप से उन घरों के लिए तैयार की गई थी, जहां मकान मालिक खुद रहते थे और सीमित संख्या में लोगों को रहने की सुविधा देते थे। लेकिन समय के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय, कोचिंग संस्थानों और रोजगार केंद्रों के आसपास बड़े पैमाने पर व्यावसायिक पीजी और निजी छात्रावास विकसित होने लगे।

यहीं से मौजूदा पीजी सुरक्षा नीति और पुराने नियमों के बीच अंतर की समस्या सामने आने लगी। पीजी कारोबार का आकार बढ़ता गया, लेकिन उसके लिए स्पष्ट और एकसमान नियामक व्यवस्था लंबे समय तक विकसित नहीं हो सकी।

विधानसभा समिति ने भी उठाए थे सवाल

डीयू के आसपास छात्रों को होने वाली परेशानियों को लेकर दिल्ली विधानसभा की एक याचिका समिति ने भी पीजी व्यवस्था की जांच की थी। अगस्त 2019 में समिति ने अधिकारियों से डीयू के आसपास संचालित पीजी और अन्य प्रतिष्ठानों की सूची तैयार करने को कहा था।

समिति ने यह भी जानना चाहा था कि पीजी आवासों पर कौन से नियम लागू होते हैं और अग्नि सुरक्षा, भवन मानकों तथा स्वास्थ्य लाइसेंस से जुड़े मामलों में किस विभाग की जिम्मेदारी है। समिति की रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों से मांगा गया नियमों और नियामक खामियों को स्पष्ट करने वाला दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया जा सका था।

2021 और 2022 में भी सामने आए नियमन के प्रस्ताव

पीजी व्यवस्था को लेकर वर्ष 2021 में तत्कालीन उत्तर दिल्ली नगर निगम ने सर्वेक्षण और ऐसे भवनों के पंजीकरण का प्रस्ताव रखा था, जिनका इस्तेमाल व्यावसायिक पीजी के रूप में किया जा रहा था।

इसके बाद 2022 में दिल्ली सरकार के गृह विभाग, पुलिस और नगर निकायों के बीच हुई बैठकों में कॉलेज छात्रों के लिए संचालित करीब 700 निजी हॉस्टल और पीजी को दिल्ली पुलिस की लाइसेंस व्यवस्था के तहत लाने का प्रस्ताव सामने आया। प्रस्ताव में रहने वालों की संख्या, रसोई, लिफ्ट, फायर सेफ्टी और अन्य सुविधाओं से जुड़े मानक शामिल करने की बात कही गई थी।

हालांकि, उस समय अधिकारियों ने यह भी माना था कि पीजी आवासों के नियमन के लिए कोई स्पष्ट वैधानिक संस्था मौजूद नहीं थी।

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मुखर्जी नगर की आग के बाद फिर हुआ सर्वे

सितंबर 2023 में मुखर्जी नगर स्थित एक महिला पीजी में आग लगने की घटना के बाद दिल्ली नगर निगम ने पीजी आवासों का दोबारा सर्वे कराया। उस समय निगम अधिकारियों ने बताया था कि रिहायशी इलाकों में पीजी चलाने के लिए कोई अलग लाइसेंस व्यवस्था नहीं है, हालांकि भवन निर्माण, भूमि उपयोग और अग्नि सुरक्षा से जुड़े नियम लागू होते हैं।

सर्वेक्षण के दौरान 100 से अधिक ऐसे पीजी आवासों की पहचान की गई, जो कथित तौर पर भवन उपनियमों का पालन किए बिना संचालित हो रहे थे।

हादसे के बाद फिर केंद्र में आया PG नियमन

सत्य निकेतन की घटना ने एक बार फिर दिल्ली में छात्रों के लिए संचालित पीजी की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रस्तावित पीजी सुरक्षा नीति में पुराने भवनों की संरचनात्मक जांच और सुरक्षा प्रमाणन को अहम हिस्सा बनाए जाने की बात सामने आई है।

सरकार की नई पहल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना बताया जा रहा है कि जिन पुराने भवनों में पीजी, स्कूल, नर्सिंग होम या अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं, उनकी संरचनात्मक स्थिति की नियमित जांच हो।

दिल्ली में पीजी सुरक्षा नीति को लेकर मौजूदा चर्चा यह भी दिखाती है कि पीजी कारोबार के विस्तार के साथ सुरक्षा और नियमन के लिए स्पष्ट व्यवस्था की जरूरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है। अब सत्य निकेतन हादसे के बाद इस मुद्दे पर सरकार के स्तर पर नई नीति तैयार करने की प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है।

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