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विदिशा की गुप्तकालीन मूर्ति में एक साथ दिखे शिव, विष्णु, शक्ति और सूर्य, 1800 साल पुरानी सरस्वती प्रतिमा भी बनी शोध का केंद्र

विदिशा की गुप्तकालीन मूर्ति में शिव, विष्णु, शक्ति और सूर्य का संगम दिखा। 1800 साल पुरानी सरस्वती प्रतिमा में वक्र वीणा ने इतिहासकारों का ध्यान खींचा।

विदिशा की गुप्तकालीन मूर्ति: मध्य प्रदेश के उज्जैन संग्रहालय में संरक्षित दो प्राचीन प्रतिमाओं ने भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझने की दिशा में नई संभावनाएं सामने रखी हैं। इनमें विदिशा जिले के बड़ोह से प्राप्त गुप्तकालीन मूर्ति विशेष आकर्षण का केंद्र बनी है। इस प्रतिमा में शिवलिंग के स्वरूप में अलग-अलग देव परंपराओं से जुड़े प्रतीकों को एक साथ दर्शाया गया है। वहीं, करीब 1800 वर्ष पुरानी सरस्वती प्रतिमा में दिखाई गई वक्र वीणा प्राचीन भारतीय संगीत परंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

एक ही प्रतिमा में कई देव परंपराओं का संगम

उज्जैन संग्रहालय में वर्ष 2016 से सुरक्षित यह गुप्तकालीन मूर्ति करीब पांचवीं शताब्दी की मानी जा रही है। विदिशा के बड़ोह से मिली इस प्रतिमा का आकार लगभग 120×37×38 सेंटीमीटर बताया गया है। इसका मुख्य आधार शिवलिंग है, लेकिन इसमें ब्रह्मा, विष्णु, शक्ति और सूर्य से जुड़े स्वरूपों को भी स्थान दिया गया है।

पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की प्रतिमा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं थी, बल्कि अलग-अलग उपासना परंपराओं को एक साथ रखने की सोच को भी दर्शाती है। उस समय शैव, वैष्णव, शाक्त और सूर्य उपासना की परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभावशाली थीं।

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क्या धार्मिक एकता का संदेश देती थी यह मूर्ति?

विशेषज्ञों का मानना है कि गुप्तकाल में विभिन्न धार्मिक परंपराओं के बीच समन्वय स्थापित करने के प्रयास भी दिखाई देते हैं। इसी संदर्भ में यह गुप्तकालीन मूर्ति महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

पुराविदों के मुताबिक, अलग-अलग देवताओं को एक ही प्रतीकात्मक संरचना में दिखाने का उद्देश्य यह संदेश देना हो सकता था कि पूजा और आराधना के तरीके भले अलग हों, लेकिन उनकी मूल सांस्कृतिक परंपरा एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। हालांकि, इस प्रतिमा के निर्माण के उद्देश्य को लेकर अंतिम निष्कर्ष के लिए विस्तृत अध्ययन जरूरी है।

शक्ति और सूर्य का समावेश इसे बनाता है खास

शोधकर्ताओं के अनुसार, इस प्रतिमा में केवल शिव, ब्रह्मा और विष्णु से जुड़े तत्व ही नहीं हैं, बल्कि शक्ति और सूर्य का समावेश भी इसे खास बनाता है। यही वजह है कि पुरातत्वविद इसे मध्य प्रदेश में मिली दुर्लभ प्रतिमाओं में शामिल कर रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, गुप्तकाल भारतीय कला, धर्म और संस्कृति के विकास का महत्वपूर्ण दौर था। इस काल की मूर्तियों में विभिन्न धार्मिक विचारों और प्रतीकों का समन्वय देखने को मिलता है।

1800 साल पुरानी सरस्वती प्रतिमा भी चर्चा में

उज्जैन संग्रहालय में रखी दूसरी प्राचीन प्रतिमा देवी सरस्वती की है। इसे लगभग दूसरी शताब्दी का माना जा रहा है और इसकी आयु करीब 1800 वर्ष बताई जाती है। पुरातत्व विशेषज्ञों के लिए इस प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता इसमें दिखाई गई वक्र वीणा है।

प्रतिमा में वीणा का घुमावदार ढांचा, ध्वनि-पेटी और तारों का स्वरूप दिखाई देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्राचीन भारत में इस्तेमाल किए जाने वाले वाद्य यंत्रों और संगीत परंपरा के अध्ययन को महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।

समुद्रगुप्त के सिक्कों से भी मिलता है समान संकेत

प्राचीन भारतीय संगीत में हार्प या वक्र वीणा जैसे वाद्यों के प्रमाण केवल इस सरस्वती प्रतिमा तक सीमित नहीं हैं। तुलनात्मक अध्ययन में बौद्ध, मथुरा और गुप्तकालीन कला में भी ऐसे वाद्यों के चित्रण के प्रमाण मिलते हैं।

गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के स्वर्ण सिक्कों पर भी उन्हें एक घुमावदार वाद्य बजाते हुए दर्शाया गया है। इससे पता चलता है कि उस दौर में ऐसे वाद्य भारतीय सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रहे होंगे।

बाद के दौर में बदलता गया वीणा का स्वरूप

पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार, छठी से 10वीं शताब्दी के बीच भारतीय कला और संगीत परंपरा में वक्र वीणा या आर्च्ड हार्प का प्रयोग धीरे-धीरे कम हुआ। इसके स्थान पर लंबी गर्दन वाली वीणा जैसे वाद्यों का महत्व बढ़ता गया।

इसी बदलाव को समझने में उज्जैन की यह प्राचीन सरस्वती प्रतिमा महत्वपूर्ण स्रोत साबित हो सकती है। यह प्रतिमा देवी सरस्वती के शुरुआती कलात्मक स्वरूप के साथ-साथ उस समय के संगीत वाद्यों की जानकारी भी देती है।

दोनों प्रतिमाओं पर तुलनात्मक अध्ययन जारी

पुरातत्व एवं अभिलेखागार विभाग के अधिकारियों के निर्देश के बाद विशेषज्ञ इन प्रतिमाओं का अन्य क्षेत्रों से मिली समान प्रतिमाओं के साथ तुलनात्मक अध्ययन कर रहे हैं। वेदों, धार्मिक ग्रंथों और मूर्तिशास्त्र से जुड़े संदर्भों को भी अध्ययन में शामिल किया जा रहा है।

पुराविदों का कहना है कि गुप्तकालीन मूर्ति और प्राचीन सरस्वती प्रतिमा दोनों भारतीय सभ्यता के अलग-अलग पहलुओं को समझने में मदद करती हैं। एक प्रतिमा धार्मिक परंपराओं के समन्वय की ओर संकेत करती है, जबकि दूसरी प्राचीन संगीत और कला के विकास की कहानी बताती है।

उज्जैन संग्रहालय में सुरक्षित ये धरोहरें इस बात का प्रमाण हैं कि मध्य प्रदेश की पुरातात्विक संपदा केवल धार्मिक इतिहास ही नहीं, बल्कि भारतीय कला, संस्कृति और संगीत के विकास को समझने के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।

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